सार्वभौमीकरण बनाम भारत तत्व

देश का शिक्षा तंत्र एक अजब से द्न्द् का शिकार है, यह द्न्द् वैचारिकता का है किंतु प्रस्फुटित हो रहा है घृणा, हिंसा, आक्रोश और राजनीतिक अलगाव और खेमेबंदी में। देश में 67 वर्षों से चली आ रही शिक्षा नीति और ढांचे में सन 1985 में बड़े परिवर्तन हुए थे और इसमें सरकारी क्षेत्र के साथ बाजार को उतार दिया गया था। इस दौर में शिक्षा, मानव संसाधनों का विकास बन गयी। पिछले 67 वर्षों में भारत में परम्परागत सरकारी शिक्षा संस्थान कांग्रेसी-वामपंथी विचारधारा और दर्शन के अनुरूप पनपे जिसमें चर्च, रूस और चीन का प्रभाव रहा और तकनीकी, प्रबंध एवं रोजगारोन्मुख शिक्षा संस्थान अमेरिका और यूरोप की आर्थिक आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित किये गए। सैद्धान्तिक रूप से देश में उच्च शिक्षा संस्थानों में अंतर्राष्ट्रीयता, विश्व बंधुत्व, धर्मनिरपेक्षता, मानवता, सार्वभौमीकरण, विश्व बाजार और शांति का पाठ पढ़ाया जाता है जो प्रथम द्रष्टयता बहुत अच्छा लगता भी है किंतु व्यवहार में यह भारत के समाज का जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्र के आधार पर विभाजन और राजनीतिक खेमेबाजी के साथ ही वैमनस्य की खाई को बढ़ाता है और नई पीढ़ी में अपने धर्म, संस्कृति और भाषा के प्रति हीन भावना पैदा करता है। इसके परिणामस्वरूप देश का शिक्षित वर्ग अंग्रेजी भाषा और पाश्चात्य संस्कृति से जुड़ता गया है, वह देशी कम्पनियों के स्थान पर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों में काम करना पसंद करता है, उसका ज्ञान और प्रतिभा देश के काम ही नहीं आती। उसे ग्लोबल कल्चर अच्छी लगने लगती है और नशा एवं ड्रग्स, सट्टा, कृत्रिम व महंगी जीवन शैली, समलैंगिकता, पोर्न कल्चर, रेसिंग-गेमिंग उसके जीवन का हिस्सा होते जाते हैं। प्रतिभाशाली किंतु आत्मकेंद्रित यह वर्ग देश और देश की जनता के हितों की कीमत पर प्रगति करता रहा है और भारत जैसे देश में इंडिया का निर्माण भी। इसे पश्चिमी देशों की सरकारों की पारदर्शी शैली और सुशासन पसंद है मगर अपने देश में कर चोरी और भ्रष्टाचार कर पैसों के पहाड़ खड़े करता रहता है। प्रश्न और चिंता का विषय यह है कि अंग्रेजों के द्वारा खड़े किये गए शिक्षा तंत्र का उद्देश्य ब्रिटिश हितों का संवर्धन था, तो फिर आजादी के बाद भी उस तंत्र को चलते रहने क्यों दिया गया? ऐसी शिक्षा जो हमारी पीढ़ी को देश और संस्कृति से न जोड़ पाये, ऐसे इंजीनियर, वैज्ञानिक, प्रबंधक और अन्य क्षेत्रों के योग्य लोग जो देश के विकास में कोई योगदान देने की जगह दूसरे देशों के हितों का संवर्धन करें और सरकार उन पर जनता से वसूला टैक्स खर्च करती रहे, कहां तक औचित्यपूर्ण है? निश्चित रूप से यह सुनियोजित षड्यंत्र देश में आज़ादी के पहले से ही चल रहा है और इसको जड़ से बदलने की जरुरत है। स्वायत्तता के नाम पर आईआईटी, आईआईएम, भगवाकरण के नाम पर एफटीटीआई, दलित की हत्या के नाम पर हैदराबाद विश्वविद्यालय, अल्पसंख्यक दर्जे के नाम पर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय व जामिया मुस्लिम विश्वविद्यालय और अब अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय व जाधवपुर विश्वविद्यालय में कांग्रेस पार्टी व अन्य विपक्षी दलों ने प्रत्यक्ष व परोक्ष जो विवाद और अराजकता पैदा की वह हैरान कर देने के साथ ही चेताने वाली भी है।

अगर देश के विश्वविद्यालय देश के लिए, देश की भाषा में सोचने वाले, देश के लिए अनुसंधान करने वाले, देश में ही रहकर नौकरी करने या उद्योग-व्यापार करने वाले नहीं पैदा कर रहे तो उनका क्या फायदा? अगर इन संस्थानों में पढ़े या पढ़ रहे छात्र देशद्रोही नारे लगाते हैं, समाज के विभाजन की विचारधारा को मजबूत करते हैं और देश की परम्पराओं और संस्कृति से नफरत करते हों तो ऐसी शिक्षा के क्या मायने? जनता के पैसों से पढऩे वाले विद्यार्थियों में देश के प्रति नफरत और अलगाव पैदा करने के जिम्मेदार राजनेताओं, नौकरशाहों, शिक्षाविदों और बुद्धिजीवियों के विरुद्ध ठोस कार्यवाही समय की मांग है, इन लोगों ने 'बांटो और राज करो की अंग्रेजों की जिस संस्कृति को आज़ादी के बाद भी देश में बनाये रखा और देश को विदेशी ताकतों के हाथों का खिलौना बनाये रखा। आज देश खोखली व आयातोन्मुख अर्थव्यवस्था, दिशाहीन व बेरोजगार नई पीढ़ी और विभाजित व अपसंस्कृति की ओर उन्मुख समाज के साथ बाज़ारू मानसिकता का शिकार हो चुका है। मोदी सरकार ने इस भयावह स्थिति का आंकलन कर शिक्षा तंत्र में आमूलचूल परिवर्तन हेतु अनेक उपाय और समितियों का गठन किया है और भारत के शिक्षा तंत्र की दुर्दशा के जिम्मेदार लोगों को चिन्हित करना शुरू कर दिया है। मोदी सरकार भारत के युवाओं में भारत तत्व का रोपण करना चाहती है और इसकी प्रक्रिया शुरू की जा चुकी है। ऐसे में भारत का चूषण करने वाला माफिया बेनकाब होने के डर से अराजकता और विवाद पैदा करने की कोशिश कर रहा है। इस माफिया के विरुद्ध सख्त कार्यवाही और दृढ़ता से भारत परक नीतियों को लागू करना वक्त की जरुरत है। अगर मोदी सरकार यह काम कर पायी तो भारत के स्वर्णिम भविष्य की गारंटी देने के लिए मैं तैयार हूं।

Universalisation vs Indianness

Education system of the country is afflicted with a strange clash. Ideological clash is being reflected as hate, violence, anguish, political distance and factions. The education policy and structure followed for the last 67 years witnessed sweeping changes in 1985. It opened the doors for market forces in education. Education literally turned into ‘development of human resources’ during this period. This is also a fact that the traditional government education institutions in the country flourished according to the Congress-left ideologies, especially under the influence of Church, Russia and China. The technology, management and employment oriented institutions were also developed according to the economic needs of the US and Europe. Principally, the higher education institutions teach the students internationality, world brotherhood, secularism, humanity, globalisation, world economy, autonomy and peace which, at first glance, seem attractive. But practically, they generate hate, political factionalism and division in the society on the basis of caste, religion and language. It also develops inferiority complex in the new generation towards their way of life, culture and language.

As a result, the so-called educated generation found itself close to English language and western culture. They also prefer to work for multi-national companies instead of the domestic companies. Their knowledge and talent are not used for their own country. They love global culture and finally get addict to drugs, gambling, artificial and costly lifestyle, gay culture, pornography, racing-gaming, etc. This talented but self-centred generation is making progress on the cost of the country and the countrymen. This is the section, which basically created India within Bharat. Like the governments of western countries, they also like transparency and good governance, but in practice, they create big empires through tax evasion and corruption.

What worries more is the fact that since this system of education was evolved by Britishes to develop the people who suit their interests and empire, then why was it continued even after Independence? Why should we continue the education system, which does not connect our young generation to its own country and culture, or the engineers, doctors, scientists, managers or qualified people in other sectors, who instead of contributing in development of their own country work for the benefit of other countries? Why should the government spend money collected as tax from the people? In fact, this game-plan is going on since before Independence and it needs to be rooted out completely. The anarchy or controversy created by opposition parities including the Congress in IIT and IIM in the name of autonomy, FTTI in the name of saffronisation, University of Hyderabad in the name of suicide by a Dalit youth, minority status to Aligarh Muslim University and Jamia Millia Islamia and now in Jawaharlal Nehru and Jadhavpur Universities in the name of freedom of expression is not just disturbing but a warning bell too.

The question is why should we continue the institutions, which do not develop the people who work for the country, think in their own language, conduct research for the country, work within the country or contribute in economic development of their own country? What is the meaning of education if the students studying in such institutions shout anti-national slogans, strengthen divisive mentality or hate the country’s traditions and culture? It is need of the hour that stern action is taken against the politicians, bureaucrats, educationists or intellectuals who generated the feeling of hatered or separatism among the students. They are the elements, which are responsible for continuing the British policy of divide and rule, and also allowed align forces to use the country as a tool.

The country is today burdened with the hollow and import oriented economy as well as directionless and unemployed new generation, which is oriented towards divisive and alien culture. In order to completely alter the education system, the Modi government, after diagnosing this situation, has constituted several committees. It has also started identifying the elements responsible for all these ills. The Modi government wants to generate the spirit of Indianness among the youth of Bharat. The process for this change has already been started. In such a situation, the mafias who have been exploiting the country for so many years stand exposed and they are trying to create an anarchy in the country by creating new controversies everyday. Need of the hour is to take stern action against such elements and enforce Bharat-centric policies. If Modi government successfully does it, I can guarantee you the fright future for Bharat.


Trustees of Maulik Bharat
  • Rajesh Goyal
  • Vikas Gupta
  • Anuj Agarwal
  • Pawan Sinha
  • Ishwar Dayal
  • Dr. Amarnath
  • Dr Sunil Maggu
  • Gajender
  • Susajjit Kumar
  • Sh.Rakesh
  • Col. Devender
  • Smt. Usha
  • Umesh Gour
  • Anant Trivedi
  • Neeraj Saxena
  • Sudesh
  • Prashant
  • Pradeep
  • Ranveer
  • Kamal Tawari

More Member


Videos