मौलिक भारत की ओर ...

BY : MB

अमेरिका में ओबामा पुन: चुनाव क्या जीते भारतीय राजनीतिज्ञों व सिविल सोसाइटी के लोगों के सांस में सांस आ गयी। यह दूसरी बात है कि ओबामा को जिताने की कोशिश में सोनिया मनमोहन की जोड़ी की गद्दी सरकती दिख रही है। भारत की राजनीति में यह तथ्य निर्विवाद रूप से माना जाता है कि वही पार्टी व नेता ही सत्तारूढ़ होते है जिन्हें अमेरिका-इंग्लैंड लॉबी का समर्थन मिलता है। मतलब जिस दल व नेता के समीकरण अमेरिका-यूरोप की कम्पनियों, लॉबिंग एजेंसियों , चर्च अर्तराष्ट्रीय फंडिग एजेंसियो व बड़ी एनजीओ के साथ ठीक ठाक होते हैं वहीं सत्तासीन हो पाता है। थोड़ा बहुत घूमफिर कर यही कहानी लगभग हर विकासशील देश में दोहराई जाती है।

पश्चिमी सैन्यबल, कूटनीति अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं पर एकाधिकार, बहुराष्ट्रीय कम्पनियों, तकनीक, प्रौद्योगिकी, अथाह धन व कुटिल व्यवसायिक बुद्धि ने ऐसा संजाल बुन रखा है कि तमाम राष्ट्रवाद व राष्ट्रहितों की बातें करने वाले दलों व उनके नेताओं को अन्दरखाने पश्चिमी देशों से तालमेल बैठाने ही पड़ते हैं। भारत की पुरातन व निरन्तरता लिए अपनी संस्कृति, जीवनशैली व विचारधारा है। अमूमन सभी राजनीतिक दल अपनी राजनीति का तानाबाना इसी के इर्दगिर्द बुनते हैं किन्तु सत्ता में आने के बाद नीतियों में बड़ी बेईमानी की जाती है। जुबानें बदल जाती है, इरादे पलट जाते हैं। प्रत्येक भारतीय राजनेता जो के न्द्र की राजनीति करता है इसी दोहरे चेहरे व दोहरापव की राजनीति के बीच जीता है। विकास के नाम पर सबने शनै: शनै: देश की मूल संस्कृति, विचारधारा, व्यापार-उद्योगों, जीवन शैली, शिक्षा स्वास्थ्य पद्धति सबको नष्ट किया है। हम पर हमारे ही नेतृत्व ने पश्चिमी तकनीक के नाम पर पश्चिमी जीवन शैली को थोपा है। ग्लोबलाइजेशन के नाम पर हमने हर वह चीज आयात की जो हम स्वयं बना सकते थे। हमारे उद्योग धंधे मर गये। हमारे शिक्षा संस्थानों के पास सारे अनुसंधान व संसाधन आयतित है, सो वे भी कुछ नया नही कर सकते, अत: कबाड़ फैक्टरी में बदल गये। हमारी नयी पीढ़ी को न अंग्रेजी ढंग से आती है, न ही हिंदी। हमारी होनहार व एन्टरप्रेरनर बन सकने वाली पीढ़ी दलाल, सट्टेबाज व व्यापारी बन चुकी है। वैज्ञानिक, श्रेष्ठ खिलाड़ी, अघ्यापक, इंजीनियर, राजनेता अथवा कुछ भी विशिष्ट हमारे पास नहीं। हमारी नीतियां देश में बेरोजगारी पैदा कर रहीं है ओर अमेरिका में नौकरियंा। हमारे उद्योग धंधे मंद है और हमारा चीन से आयात बढ़ रहा है। हमारे सिविल, मेकेनिकल, इलेक्ट्रिकल, केमिकल आदि ब्रांचो के इंजीनियर सिर्फ और सिर्फ आई टी क्षेत्र व बीपीओ में नौकरी कर पा रहे हैं। बाकी ब्रांचो में तकनीकी व बना बनाया सामान आयतित हो रहा है तो ये लोग क्या करें?

निजीकरण ने प्राकृतिक व खनिज संसाधनो की लूट मचा दी है। सरकारें व व्यवस्था में बैठे लोग स्पष्ट पारदर्शी व व्यवस्थित नियम, कायदे व कानून बनाने के स्थान पर उद्योगपतियो के साथ लूट साँझा कर रहे हैं। बहुराष्ट्रीय कंपनियंा, एफडीआई की आड़ में सभी राष्ट्रीय महत्व के उद्योगों व खनिजों पर काबिज होने की तैयारी कर रही हैं तथा भारतीय उद्योगपतियों के साथ उपक्रम लगा रही है। कुछ सिविल सोसाइटी आंदोलन भी इसी कारपोरेट गठजोड़ का शातिर खेल हैं (जिसको अमेरिका-यूरोपीय भारतीय कंपनियों से भरी मात्रा में पैसा मिल रखा है)। देश विशुद्ध कारपोरेट जंग का शिकार है जिसमें कारपोरेट, सिविल सोसाइटी को हथियार बनाकर छद्म युद्ध खेल रहे हैं। निजीकरण ने देश को 'बनाना रिपब्लिकÓ बना दिया है। हमारे पास गैस, लोहा कोयला व अन्य खनिज सबके अकूत भंडार है किन्तु निजीकरण ने इनके दामों में तो आग लगा दी है पर उत्पादन शून्यहै। आश्चर्यजनक यह है कि निजीकरण की आड़ में चल रहे क्रोनी-केपिटलिज्म व अमानवीय सट्टे के खेल को रोकने की माँग कहीं नहीं उठ रही? अगर हम उदारीकरण के साथ कानून के शासन, नियमीकरण, कारपोरेट गवर्नेंस व सुशासन की व्यवस्था नहीं कर सकते तो पुन: इन संसाधनो का राष्ट्रीयकरण क्यों नहीं कर दिया जाना चाहिए?

विश्व बदल रहा है और पुन: अन्तर्राष्ट्रीय वाद से राष्ट्रवाद की ओर मुड़ रहा है, ऐसे में सच तो यह है कि अंतत: हमें अपनी जड़ों की ओर ही लौटना होगा। हम अमेरिका-यूरोप के राष्ट्रीय हितों के प्रति चिंतित होने की जगह अपने राष्ट्रीय हितों के प्रति जागरूक हों। अमेरिका-यूरोप की संस्कृति व जीवन शैली अपनाने की जगह अपनी संस्कृति व जीवन शैली की ओर वापस लौटें। ग्राम स्वराज, स्वभाषा एवं प्रौद्योगिकी, स्वरोजगार से ही हमारी पीढिय़ों का भला होगा। पिछले दो सौ वर्षो में हमने अपने आत्मनिर्भर देश जहां प्रत्येक व्यक्ति सम्मानित जीवन जी रहा था, को शाश्वत संघर्ष व फजीहत की जिंदगी में धकेल दिया हैं। आइये, फिर से मिलें, विचार करें, एकजुट हों और लौटें अपने उसी मौलिक भारत की ओर, आत्मसम्मान की ओर, राष्ट्र स्वाभिमान की ओर। यक्ष प्रश्न

पिछले एक दशक के यूपीए सरकार के संचालन से उसके दर्शन व कार्यक्रमों को स्पष्ट रूप से समझा जा सकता हे। यह पूर्णत: बाजारवादी व उपभोक्तावादी दर्शन है जहाँ पाश्चात्य जीवन शैली, खुलापन, नशा-हथियारों की होड़, अश्लीलता, भ्रष्टाचार व घोटाले, बेतरतीब विकास, सामंती शासन प्रणाली के साथ अमीरों के पक्ष में नीतियां और गरीबों के लिए ऋण माफी, नरेगा, वजीफा व नकद राशि जैसे प्रावधान हैं। कांग्रेसी नीतियां गरीब को गरीब बनाये रख वोट बैंक बनाये रखने की हैं और उसे इनके सहारे चुनाव जीतने आते हैं।

क्षेत्रीय दल, भाजपा एवं एनडीए कमोबेश यूपीए के मॉडल पर ही अपनी नीतियां बनाते हैं। मुख्य मुद्दा भारतीय बनाम पाश्चात्य जीवन शैली तथा बहुसंख्यकवाद बनाम अल्पसंख्यकवाद का है। एनडीए खुलेपन व अश्लीलता का विरोध करता है किन्तु बाजारवादी नीतियों में यूपीए व एनडीए मे कोई विरोध नहीं दिखता।

किन्तु यक्ष प्रश्न राष्ट्र का है। हमारे संवैधानिक मूल्यों, नीति निर्देशक तत्वों व मूल कर्तव्यों को स्थापित करने का है। सच्चाई यह है कि सत्ता की होड़ में यूपीए व एनडीए दोनों ही संविधान की मूलभूत भावनाओं के मौलिक दर्शन को छोड़ चुके हैं। हमारे नेता पश्चिमी देशो की नीतियाँ, कानूनों, प्रणालियों व दबावों के प्रभाव में हैं। बाकी कसर दलों की आपसी गुटबाजी, व्यक्तिगत अहम् एवं शीघ्र सफल होन के लिए हर हथंकडा प्रयोग करने की मानसिकता निकाल देती है।

वास्तव में संसदीय शासन व्यवस्था मात्र गुटों का ही प्रतिनिधित्व करती है व्यक्तियों व आम जनता का नहीं। क्या मोदी या राहुल देश को और अधिक लोकतांत्रिक बनाने का कोई प्रस्ताव जनता के सामने रखेंगे? क्या वे दलों में आंतरिक लोकतंत्र को लागू करने की कार्यप्रणाली विकसित करेेंगे। क्या उनके पास सुशासन के साथ संवैधानिक संस्थाओं की विश्वासबहाली, कानून के शासन, संविधानवाद व कारपोरेटवाद के बीच संतुलन, भारत की शाश्वत संस्कृति, चिन्तन धारा, सभ्यता और जीवन शैली भारतीय अध्यात्म, विज्ञान व कलाओं का विकास व विश्व बाजार में भारत की महत्वता की पुनस्र्थापना हेतु कोई कार्यक्रम है? क्या वे हमारे मीडिया, फिल्में, जनसंचार व शिक्षा संस्थानों को भ्रम फैलाने के काम व पश्चिमी प्रभावों से मुक्त करा 'मौलिक भारतÓ की स्थापना की ओर अग्रसर कर सकेंगे? क्या वे गम्भीर है ऐसे देश के विकास के लिए जहां भूख, गरीबी अशिक्षा व अपमान नहीं होगा? स्त्री बच्चों व बुजुर्गो को सम्मान व बराबर का हक होगा? ऐसी व्यवस्था जो सौ प्रतिशत भारतीय होगी व भारत को दिशाहीन विश्व के सामने एक प्रतिमान के रूप में स्थापित कर सकेगी। यदि नहीं तो न राहुल और न ही मोदी, हमें नये विकल्प तलाशने होंगे।

शैने: शैने: क्षरण
ऐसा लगता है कि हमारा देश सम्मलित रूप से सत्य से असत्य की ओर, प्रकाश से अंधकार की ओर एवं विकास से विकार की ओर बढ़ रहा है। हमारी संवैधानिक संस्थाएं व सरकारी तंत्र के साथ-साथ वित्तीय तंत्र सभी तीव्र गति से 'भस्मासुर' प्रवृत्ति की ओर बढ़ रहे हैं। प्रधानमंत्री व मंत्रिपरिषद तो अपनी विश्वसनीयता बहुत पहले ही गँवा चुके हैं। हमारी न्यायप्रणाली की विश्वसनीयता सर्वाधिक संदेहों के घेरे में है। हमारे न्यायाधीश न्याय प्रक्रिया को जानबूझ कर लटका रहे हैं, एक ही कानून की दो-दो व्याख्याएं कर रहे हैं और दोषी लोगों व अपराधियों को दण्ड देने में पक्षपात कर रहे हैं अथवा दण्ड ही नहीं दे रहे हैं। नारी उत्पीडऩ व भ्रष्टाचार के मामलों में तीव्र न्यायिक प्रक्रिया, व्यापक जनाक्रोश के बाद भी नहीं प्रारम्भ हो पायी है और व्यभिचारी व भ्रष्टाचारी खुले आम घूम रहे हैं। अभी हाल ही में उच्चतम न्यायालय ने लोकायुक्त के मामले में गुजरात व कर्नाटक के सबंध में दो अलग-अलग व्याख्याएं दी हैं, जो एक घातक संकेत है। दिल्ली में सी बी आई की विशेष अदालत ने शिक्षक भर्ती घोटाले में हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री ओम प्रकाश चौटाला के साथ-साथ उच्चतम न्यायालय में इस घोटाले की जाँच की मांग करने वाले सिविल सेवा के अधिकारी संजीव कुमार को भी अपराधी घोषित कर सजा दे दी। यह सारी बातें न्यायपालिका व राज व्यवस्था के मध्य गहरी संाठ-गांठ के खुले संकेत देती हैं। इस मामले में सीबीआई पर भी सरकार के इशारे पर काम करने के आरोप लग रहे हैं।

हमारी संसद अब न के बराबर काम करती है। जनहित के विधेयकों को लगातार टाला व लटकाया जा रहा है और विदेशी हितों की पूर्ति के कानून बड़ी आसानी से पास हो रहे हैं। हमारे संासदों के भ्रष्टाचारी, व्यभिचारी व अपराधी होने के प्रमाण बिखरे पड़े हैं किन्तु वे इसे ही सांसद होने की न्यूनतम योग्यता मान बैठे हैं। राज्यों की विधान सभाएं तो मुख्यमंत्रियों की कठपुतलियां बहुत पहले ही बन चुकी हैैं। हमारे राजनीतिक दलों के प्रमुख पदों पर भी परिवारवादी व व्यापारिक मानसिकता के अपरिपञ्चवलोगों का कब्जा हो चुका है।

हमारी नौकरशाही कभी लोक सेवक बन ही नही पायी है। पर्दे के पीछे खेल खेलने के माहिर ये लोग उन्हीं गुणों से सम्पन्न है जिनसे हमारे सांसद। इनकी जवाबदेही शून्य है और अधिकार अपरिमित। हमारी सीबीआई, पुलिस व अद्र्धसैनिक बल राजनीतिज्ञों का मोहरा हैं और इन दोनों के गठजोड़ ने देश में पुलिस राज बना रखा है, जिसमें आम भारतीयों के लोकतांत्रिक अधिकारों का कोई मतलब ही नहीं रह गया है। हमारी व्यवस्था के सभी प्रमुख पदों पर गणतंत्र के तहत अवैध तरीके से अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को नियुक्त किया जा रहा है। अल्पसंख्यकों की नियुक्ति होना कोई गलत बात नहीं है किन्तु वरीयता क्रम का उल्लंधन कर कम योग्य लोगों को ऐसे पदों पर बैठाने का मतलब इन महत्वपूर्ण संस्थानों की गरिमा, गुणवत्ता व कार्यप्रणाली पर कुठाराधात करना होता है। हमारे चुनाव आयोग की निष्पक्षता व स्वायत्तता भी सवालों के घेरे में हंै, वह सत्तारूढ़ दल का एजेन्ट सा लगने लगा है। वह चुनावों के आंकड़ों को लेकर भ्रमित करता है। चुनाव आचार संहिता के खिलाफ प्रभावी कार्यवाही करने में असमर्थ है और इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीनों की गड़बडिय़ों पर उसकी आंखे बंद है।

हमारे बैकिंग व वित्तीय संस्थानों को सरकार द्वारा उद्देश्यहीन व दिशाहीन ऋण देने पर मजबूर किया जा रहा है। हमारे औद्योगिक घरानों के पास 20 लाख करोड़ के ऋण हैं किन्तु उसका उपयोग विदेशों में निवेश के लिए किया जा रहा है जो सरासर धोखा है। हमारे बैंकों द्वारा कृषि क्षेत्र के लिए आंवटित ऋण शहरी क्षेत्रों को दिये जा रहे है। स्वयं उद्योग जगत 13 लाख करोड़ की कर माफी ले चुका है। किन्तु आम आदमी को मिलने वाली 3-4 लाख करोड़ रूपये सालाना की सब्सिडी भी समाप्त करने के लिए उन्होंने सरकार को मजबूर कर दिया है। देश के मध्यम वर्ग व किसानों को सरकार बढ़ते जनक्रोश के बीच कुचलने पर आमादा है। वह अपनी आवाज ऊँची न कर सके इसीलिए महँगाई बढ़ाकर उसे जीवन संघर्ष में उलझाया जा रहा है। मीडिया समूहों व संचार माध्यमों के साथ ही सोशल मीडिया पर अघोषित रूप से आपातकालीन प्रतिबंध लगाये जा रहे है तथा उन्हें धमकी, पैसा व विज्ञापन देकर खरीदा जा रहा है।

देश अमेरिका, यूरोपीय देश और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के षड्यंत्रों का अड्डा बन गया है। सब एक दूसरे को पैसा फेंक कर खरीद-बेच रहे है। खरीद फरोख्त के इस खेल में मँझधार में और बीच बाजार में फंसता जा रहा है आम भारतीय। एक अधूरा सा व्यक्तित्व, आधी अधूरी बौद्धिकता, कभी भरा तो कभी खाली पेट और बटूआ। कभी भारतीय तो कभी पश्चिमी, कभी शहरी तो कभी ग्रामीण, कभी आधुनिक तो कभी पिछड़ा। बाजार ने पेंडुलम बना दिया है उसे। व्यवस्था न तो उसे उसके परम्परागत स्वरूप मेंं रहने देना चाहती है और न ही उसे पूर्णत: आधुनिक बनाना चाहती हैं। उसको फुटबॉल बना दिया गया हैं। उसके मौलिक विकास का हक उससे छीन लिया गया है। दोहरे चरित्र की व्यवस्था ने देश को ही दोहरा कर दिया। वोट बैंक और बाजार के खेल में कैसे बनेगा मौलिक भारत?​


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