असफल राजव्यवस्था एवं मौलिक भारत

BY : MB

पिछले कुछ वर्षो से देश में कई सारे आंदोलन चल रहे हैं। ये आंदोलन इस बात के प्रतीक हैं कि देश में एक प्रकार का असंतोष व्यापक पैमाने पर पल रहा है। परंतु ये आंदोलन इस असंतोष को सकारात्मक दिशा दे पाने में असफल हो रहे हैं। ऐसे में जरूरत है देश को उसके जड़ों यानी मौलिक भारत की ओर वापस ले जाने की। कैसा स्वरूप होगा मौलिक भारत का और उसे कैसे पाया जा सकेगा, यह गहन चिंतन का विषय है।

छले दो दशकों में देश व्यापक बदलावों के कुचक्र का शिकार रहा। इस समय में बाजारवाद, उदारवाद, व पूंजीवाद के नाम पर एक साजिश के तहत बहुराष्ट्रीय कम्पनियों, भारतीय कारपोरेट, विकसित देशों एवं भारत की राष्ट्रीय राजनीति कर रहे दलों, चर्च एवं अंतर्राष्ट्रीय एनजीओं ने देश को एक 'पिलपिले लोकतंत्रÓ में बदल दिया है। हथियारों, ड्रग्स, पोर्नोग्राफी एवं सट्टे के साथ पुरानी विदेशी तकनीक का डम्पिंग ग्राउंड बन गया हमारा देश। खुली अर्थव्यवस्था ने हमारी संस्कृति, सांस्कृतिक मूल्यों, विरासत, हमारे ग्रामीण कृषि कुटीर, सहकारी अर्थव्यवस्था, संयुक्त परिवार, शिक्षा, स्वास्थय व भाषा सभी को तहस-नहस करने की पुरजोर काशिश की है। देश के संसाधनो विशेषकर खनिज पदार्थो को सत्तारूढ़ सरकारों ने खुलेआम लूटा है। देश की अर्थव्यवस्था मंदी का शिकार है। बेरोजगारी चरम पर है। पिछले दस वर्षो में मात्र 20 लाख नये रोजगार सृजित हुए है। यद्यपि जनसंख्या 25 करोड़ बढ़ चुकी है।

बाजार 20-25 प्रतिशत सिकुड़ चुका है किंतु मंहगाई बढ़ाकर तथा प्रत्येक क्षेत्र में आंकडों में फर्जीवाडा कर झूठी तस्वीर जनता को दिखाई जा रही है। पिछले एक दशक में देश की 15-20 प्रतिशत आबादी मध्य वर्ग से पुन: निम्न मध्यम या निम्न वर्ग में आ चुकी है। पिछले चार वर्षो से भारत के उद्योगपतियों ने एक भी पैसा देश में नही लगाया है। उनका सारा निवेश अफ्रीका, यूरोप व अमेरिका आदि में हो रहा है। देश में विदेशी निवेश के नाम पर मारीशस व सिंगापुर रूट से कालाधन ही सफेद होकर वापस आ रहा है। देश की सफेद अर्थव्यवस्था काली अर्थव्यवस्था की एक चौथाई मात्र है। सत्ता व उद्योगपतियों का काकटेल देश को लूट रहा है। हम एक अराजक देश के नागरिक है। अपराध आम बात है। बच्चों, वृद्धों व महिलाओं के आत्म सम्मान की रक्षा अब मुश्किल होती जा रही है। अलगाववाद, साम्प्रदायिकता, आतंकवाद व क्षेत्रवाद का बोलबाला है। पड़ोसी देशो से हमारे संबंध ठीक नही है और सीमाओं पर हमेशा तनाव रहता है। सैन्य खर्च लगातार बढ रहे है। देश में हर समय कही न कही चुनाव एवं स्थानांनतरण होना आम बात है। राजनीतिक दल गिरोह बन चुके हैं और इन पर परिवारों का कब्जा है और आंतरिक लोकतंत्र शून्य है। आम जनता रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा, स्वास्थय, रोजगार एवं न्याय की जद्दोजहद से ही निकल नही पा रही है। आम भारतीय के पास आत्म सम्मान जैसी कोई चीज नही है। देश एक स्लम में बदलता जा रहा है। प्राकृतिक एवं पर्यावरण संतुलन की कोई प्रभावी व्यवस्था ही नही है। हमारी संवैधानिक संस्थाओं को खोखला किया जा है एवं उनकी गरिमा नष्ट की जा रही है। देश को सामंतवादी व मुगलकालीन राजतंत्र के ढर्रे पर चलाया जा रहा है, जहां चापलूसी एवं चमचागिरी का राज है देश का संवैधानिक ढांचा पुनर्विचार एवं पुनर्गठन की मांग कर रहा है और केन्द्र राज्यों के संबंधो में भी भारी तनाव है। इन पर गंभीर पुनर्विचार एवं बदलाव आवश्यक है। राज्यों का पुनर्गठन समय की मांग है तो सत्ता व संसाधनों का विकेन्द्रीकरण भी जरूरी है, किन्तु राजव्यवस्था इसके प्रति उदासीन है। देश दलालों, सट्टेबाजों एवं बड़े व्यपारियों का स्वर्ग बन गया है। इसके बहुआयामी विकास को अनदेखा किया जा रहा है। हमारा आंदोलन इस व्यवस्था को बदल, आगे दिये गये दृष्टिïपत्र के अनुरूप देश का पुनर्निर्माण करने के लिए है। हम मात्र सुशासन की पुर्नस्थापना ही नहीं वरन राष्टï्र हित में नीतियों में भी प्रबल बदलावों के पक्षधर हैं।

इन विकट स्थितियों में हमारी मांगें हैं -

ठ्ठ राजनीतिक दलो में आंतरिक लोकतंत्र हेतु संवैधानिक प्रावधान एवं चुनाव सुधार।
ठ्ठ पूरे देश में शिक्षा को पुर्नपरिभाषित करे तथा एक समान शिक्षा व स्वास्थ्य व्यवस्था सरकारी खर्च पर।
ठ्ठ भूमि अधिग्रहण कानून को आवश्यक सुधारों के साथ तुरन्त लागू करना।
ठ्ठ शहरों की सीमाओं की हदबंदी तथा शहरी ग्रामीण क्षेत्रों का स्पष्ट बंटवारा।
ठ्ठ अनिवार्य बैंक अकाउंट व पहचान पत्र प्रत्येक नागरिक को।
ठ्ठ खनिज एवं प्राकृतिक संसाधनों पर जनता का हक एवं सरकार मात्र उसकी कस्टोडियन एवं जनहित में ही उसका दोहन।
ठ्ठ राष्ट्रीय जननिगरानी तंत्र का विकास।
ठ्ठ सटटे व वायदा कारोबार पर रोक।
ठ्ठ व्यापक पुलिस एवं प्रशासनिक सुधार।
ठ्ठ सस्ता, सुलभ व त्वरित न्याय।
ठ्ठ स्थानीय निकायो का आर्थिक सशक्तिकरण व अधिक अधिकार।
ठ्ठ भारतीय भाषाओं में सभी प्रकार की शिक्षा व प्रतियोगिताऐं।
ठ्ठ मीडिया/ मनोरंजन जगत एवं पोर्नोग्राफ्री साइटों के लिए स्पष्ट गाइडलाइन।
ठ्ठ स्पष्ट युवा नीति जिसमें बेरोजगारी उन्मूलन हेतु प्रावधान हो।
ठ्ठ हमारी राष्ट्रीय व्यवस्था में 'लोकसेवकों के दायित्व एवं जनता के
अधिकारÓ नामक विचारधारा का समावेश हो। संकल्प पत्र
ठ्ठ हम विशुद्व राष्ट्र आधारित व भारतीयता के पक्षधर है।
ठ्ठ हम किसी शक्ति/ राजनीतिक दल से प्रायोजित नही है।
ठ्ठ हम अपने अपने क्षेत्रों में अपने अपने स्तर पर राष्ट्र निर्माण के लिए कार्यरत है।
ठ्ठ हम व्यक्तिगत अहम का शिकार नहीं हैं और समाज सेवा हमारे लिए धंधा नही है।
ठ्ठ हम मानते है कि सामूहिक प्रयासों से ही उपरोक्त समस्याओं का समाधान संभव है।
ठ्ठ हम अपनी अपनी संस्था की स्वतंत्र पहचान के साथ ही मौलिक भारत अभियान के दृष्टिपत्र से पूर्णत: सहमत हैं।
ठ्ठ हम अपनी संस्था की सभी प्रचार सामग्री में मौलिक भारत अभियान का लोगो प्रयोग करेगें तथा अपने दर्शन व संस्था के उद्देश्यों को मौलिक भारत अभियान के समरूप करेगें।
ठ्ठ हम आवश्यकता पडने पर तन-मन-धन सभी से इस अभियान को अपना सहयोग देगें।
ठ्ठ हम सामूहिक शक्ति द्वारा राजनीति के मुददों व माहौल को बदलने का प्रयास करेगें और कोशिश करेगें कि आगामी चुनाव हमारे दृष्टिकोण पत्र में वर्णित मुददों के इर्द-गिर्द ही हो।
ठ्ठ हम हमेशा मौलिक भारत अभियान की केन्द्रीय संचालन समिति के निर्णयों को व्यवहार में लाने के लिए प्रयासरत रहेगें।

नए नेतृत्व की विशेषताएं नए नेतृत्व के विकास की बात सामने आते ही यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि गांव से केंद्र तक नई उभरने वाले नेतृत्व में क्या गुण होने चाहिए। यहां पर इस पक्ष पर प्रकाश डाला जा रहा है -

संपूर्ण देश में समान विचार व मानसिकता के लोगों व संस्थाओं के साथ समन्वय स्थापित कर कार्यक्रम के विकास व प्रसार की रूपरेखा बनाई जा रही है। परस्पर विचार विमर्श से जो महत्वपूर्ण तथ्य उभर कर आया है उसमें नेतृत्व करने वाले नेता के गुणों की स्पष्ट व्याख्या देना जरुरी माना गया है। अव्यवस्था व भ्रष्टाचार से भरे माहौल में बड़ी जरुरत ऐसे लोगों के चयन की है जो ग्राम , वार्ड , ब्लॉक , तहसील , जिले , राज्य और अंतत: केंद्रीय स्तर पर नेतृत्व देने की क्षमता रखते हों। सामान्यत: यह माना जाता है कि जिले स्तर तक के नेतृत्व करने वाले लोगों को स्थानीय मुद्दों की समझ , बेहतर जनसंपर्क , लगातार जनता से संवाद , साधारण वक्तव्य क्षमता और लगातार व्यवस्था की गलतियों को उजागर करना और सुधार के लिए दबाव बनाए रखना होता है। वास्तविकता यह है कि केंद्र से व राज्यों से प्रस्तावित योजनाएं जिलों और ब्लॉकों तक आते- आते दम तोड़ चुकी होती हैं। योजनाओं के बारे में जनता तो क्या नेताओं तक को ही ढंग से पता नहीं होता और दलों की जिला इकाईयां इसका व्यवस्थित अध्ययन भी नहीं करती हैं। अगर योजनाओं , उनमें आवंटित धन व क्रियान्वयन की स्थिति के बारे में ग्राम , ब्लॉक , तहसील व जिले के स्तर पर स्पष्ट जानकारी हो तो उसके संबद्ध व सही क्रियान्वयन की पारदर्शी व्यवस्था की जा सकती है। ऐसा तभी संभव है जब निचले स्तर पर कार्यकर्ताओं व नेताओं को इसका संपूर्ण ज्ञान हो। विकास तभी दिखेगा जब वह निचले स्तर पर कार्यान्वित होगा। सचिवालयों एवं निदेशालयों के गलियारों से निकलकर वह अंतत:जिलों के कार्यालयों की फाइलों में ही दम तोड़ देता है , और अगर कार्यान्वित होता भी है तो आधा-अधूरा और भारी बंदरबांट के साथ।

अत: ग्राम व ब्लॉक स्तर की लीडरशिप इतनी सक्षम हो जो स्वयं ईमानदार हो , सुचिता में विश्वास रखती हो और प्रत्येक आने वाली योजनाओं व धन की पाई-पाई का हिसाब रख सकती हो , उसके बेहतर क्रियान्वयन के लिए सुझाव दे सकती हो और अपने हाथ में नेतृत्व के आ जाने के बाद उसके वास्तविक क्रियान्वयन की क्षमता भी रखती हो। स्थानीय दबावों यथा परिवारवाद, वंशवाद, जाति, धर्म, क्षेत्र, भाषा, उद्योग , व्यापार समूहों व अन्य हित समूहों के दबावों के बीच सबके संविधान सम्मत विकास की अवधारणा को वास्तविकता में लाने की क्षमता रखती हो। परस्पर संवाद, सामूहिक विचार-विमर्श, पारदर्शिता आदि के गुण इसमें अपरिहार्य हैं। राज्यों व केंद्र की राजनीति में आने के लिए अर्थव्यवस्था, प्रशासन, टेक्नोलॉजी, आईटी , कूटनीति व राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों की व्यापक समझ व गहरी प्रशासनिक क्षमता व नेतृत्व के गुण आवश्यक हैं और उससे भी ज्यादा जरुरी है सार्वभौमिक मूल्यों, भारतीय संस्कृति, राष्ट्र के प्रति प्रेम, देश के लिए आत्मसम्मान की भावना और टिकाऊ विकास की अवधारणा पर काम करने की मानसिकता। ईमानदारी, पारदर्शिता एवं सामूहिक नेतृत्व की भावना और मात्र राष्ट्र हित में निर्णय लेने की मानसिकता इससे भी ज्यादा जरुरी है।​


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