संकल्पना, लक्ष्य एवम् कार्ययोजना

BY : MB

संकल्पना
'भारतीयताÓ मौलिक भारत की संकल्पना का मूलाधार है। 'भारतीयताÓ उन दस लक्षणों का संगम है, जिन्हें लगभग सभी धर्म व संप्रदायों में धर्म का लक्षण माना गया है। इन दस लक्षणों की पालना न करना अधर्म कहा जाता है: धृति, क्षमा, दमोस्तेयं, शौचमिन्द्रियनिग्रह:। धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मं लक्ष्णम्।। कहना न होगा कि ÓभारतीयताÓ गुण, विचार व व्यवहार का एक ऐसा संगम है, जो राष्ट्र के सम्मान को अपना संकल्प और विश्व के प्रत्येक प्राणी के कल्याण को अपना अंतिम लक्ष्य मानता है। गौरतलब है कि प्रत्येक प्राणी का मतलब सिर्फ इंसान नहीं, बल्कि प्रकृति का रचा प्रत्येक जीवन है; साथ ही विश्व का मतलब सिर्फ सभी देश नहीं, पूरी प्रकृति है।

लक्ष्य
भारतीयता के इसी गुण, विचार और व्यवहार को हासिल करना 'मौलिक भारतÓ का लक्ष्य है। 'मौलिक भारतÓ का ऐसा विश्वास है कि भारत के नागरिकों के भीतर ÓभारतीयताÓ के मूल गुणों के विकास से मात्र से ही भारत की वर्तमान कई सामाजिक, राजनैतिक व व्यवस्था संबंधी समस्याओं से निजात मिल जायेगी। 'भारतीयताÓ का विकास ही अंतत: व्यवस्था, राजनीति व हमारे मानस में अपेक्षित व्यापक बदलाव का मार्ग प्रशस्त करेगा। उसका यह भी ऐसा भी विश्वास है कि आज समस्याओं को चक्र इतना व्यापक व अनवरत् है कि उनका समाधान अकेले किसी भी शासन या प्रशासन के बूते की बात नहीं है। इसके लिए समाज को जिम्मेदार भूमिका में आना ही होगा। पहला पायदान: 'मुमकिन हैÓ का भरोसा

'कुछ नहीं हो सकताÓ की जगह 'मुमकिन हैÓ का भरोसा कायम करना 'मौलिक भारतÓ का पहला कदम है। नकरात्मक सोच के वर्तमान दौर में सकरात्मक और रचनात्मकता के वातावरण विकसित करना लक्ष्य की सीढी चढने की दिश में पहला पायदान हो सकता है।

तीन कार्य
मौलिक भारत अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए तीन तरह के कार्र्यों को आवश्यक मानता है: ठ्ठ सकरात्मक व रचनात्मक गतिविधियों को प्रकाश में लाना, ताकि 'मुमकिन हैÓ का भरोसा लोगों में कायम हो सके। 'मौलिक भारतÓ का विश्वास है कि इस भरोसे का कायम होना, लोगों को सकरात्मकता व रचनात्मकता के ंिलए प्रयास हेतु प्रेरित कर सकेगा। इन दोनो के फैलने से नकरात्मकता और विनाशक शक्तियां व प्रवृतियां स्वत: ही नियंत्रित होने लगेगीं।

सकरात्मक-रचनात्मक शक्तियों की गतिविधियों और उनके उठाये मुद्दों के प्रति समर्थन जुटाना.... उन्हेे सशक्त करना और तद्नुसार शासन-प्रशासन को निर्णय व नीति निर्माण के लिए विवश करना। 'मौलिक भारतÓ का ऐसा विश्वास है कि ऐसा कर हम सकरात्मक व रचनात्मक शक्तियों को एकजुट करने के एक ऐसे दायित्व क ो निर्वाह करेंगे, जिसकी मांग लंबे समय से उठती रही है। ''ज्यों-ज्यों होय धर्म कै हानी...ÓÓ के जरिए तुलसीदास से जिस प्रभु के अवतरण की बात कही है, वह कुछ और नहीं प्रभावी रचनात्मक शक्तियों का अवतरण ही है। विविध रचनात्मक शक्तियों को एकजुट करने तथा मर्यादित सक्षमता प्रदान करने के कारण ही राम को मर्यादा पुरुषोत्तम कहा गया। महत्व के मुद्दों पर भारतीयता के अनुकूल, स्पष्ट व सकरात्मक राय का निर्माण कर सशक्त तरीके से शासन-प्रशासन के प्रस्तुत कर उसे तद्नुसार निर्णय व नीति निर्माण को विवश करना।

समझदार, सक्षम, संकल्पित और भारतीयता के मानदंडों पर खरे नेतृत्व का विकास करना। कहने को आज भारत में जनतंत्र है, लेकिन क्या यह सच नहीं कि आज हमारे जनप्रतिनिधि स्वयं को हमारा शासक समझते हैं? 'मौलिक भारतÓ का ऐसा विश्वास है कि संसद, विधानसभा, जिला-ग्राम पंचायतों, टाउन एरिया कमेटी आदि सही मायने में सत्ता नहीं, जनप्रतिनिधित्व का आइना बन सकें; इसके लिए भारतीयता की संकल्पना के अनुरूप जनप्रतिनिधियों की टीम तैयार करना जरूरी है। इसी तरह सामाजिक - प्रशासनिक - वैज्ञानिक व अन्य क्षेत्रों में भी भारतीयता की सोच वाले नेतृत्व विकास का काम भी जरूरी है।

अच्छा नेतृत्व
मौलिक भारत की निगाह में 'मौलिक भारतÓ मानता है कि सच्चा और अच्छा नेतृत्व वह होता है......
जो युवा हो (गौरतलब है कि 'युवाÓ तन नहीं, मन की अवस्था हैै।);
जो उन्हें बखूबी समझता हो, जिनका नेतृत्व उसे सौंपा गया है;
जो भारतीयता के गुणों से परिपूर्ण हो;
जो अपने प्रति अपने साथियों के मन में गहरी आस्था व अपनापन जगा सके;
जो खुद बोलने की जरूरत न हो, उसका काम बोले;
जो खुद इस बात पर यकीन करता हो और जन-जन को यह यकीन दिलाने में सक्षम हो कि हमारे आस-पास बहुत कुछ सकरात्मक घट रहा है;
जिसकी अपनी दृष्टि होती है, दूरदर्शिता होती है, लेकिन उसमें जन फैसले के सम्मान की उदारता और अपनी सफ लताओं/कार्यों का श्रेय खुद की बजाय दूसरों को देने की हिम्मत हो;
जिसमें सकरात्मक जनमत निर्माण की क्षमता हो;
जो जनमत को लागू करा सके।

जनसंसदों का आयोजन व गठन : पहला कदम उक्त तीन कार्यों को अंजाम देने के लिए प्राथमिक दौर में मौलिक भारत के पूरे भारत में जनसंसदों के आयोजन और गठन का इरादा रखती है।

आयोजन का मकसद समस्याओं के समाधान व सकरात्मकता के प्रसार में सबसे बड़ी बाधा है - संवादहीनता। जनसंसद का सबसे पहला मकसद है कि संवादहीनता समाप्त कर संवाद के सक्रिय, साझे व रचनात्मक मंचों का विकास करना।

दूसरा महत्वपूर्ण मकसद महत्व के मुद्दों पर रायशुमारी के साथ-साथ सकरात्मक शक्तियों व गतिविधियों की पहचान करना है। तीसरा मकसद है जब और जिस स्तर पर समस्या हो, तब और उसी स्तर पर और प्रभावितों की राय से समाधान प्रस्तुत करना।

गठन का मकसद सकरात्मक शक्तियों को एकजुट कर उन्हें भारत व भारतीयता के विकास व नेतृत्व में योगदान के लिए तैयार करना है। जनता की राय को सरकार हल्के से न ले, इसके लिए एक सशक्त फोरम तैयार करना भी जनसंसद के गठन का अन्य महत्वपूर्ण मकसद है।

जनसंसद: गठन का स्वरूप
प्रत्येक न्यायपंचायत-जनसंसद की ग्राम पंचायत, प्रत्येक तहसील-जनसंसद की जिला पंचायत/पार्षद स्तरीय इकाई, प्रत्येक जिला जनंससद का विधानसभा क्षेत्र होगी। क्रमश: प्रत्येक स्तर के प्रतिनिधियों का नेतृत्व अगले स्तर का प्रतिनिधि होगा। विधानसभा का नेृतत्व करने वाले राष्ट्र स्तर पर गठित संसद में प्रतिनिधित्व करेंगे। सकरात्मक व जमीनी काम के जरिए प्रदेश/राष्ट्र के स्तर पर अपनी अच्छी पहचान कायम कर चुके लोग संसद/विधानसभा के दूसरे सदन में प्रतिनिधित्व करते हुए वैचारिक व मार्गदर्शक शक्ति की भूमिका निभायेंगे। स्तर में आवश्यकतानुसार बदलाव के साथ वैज्ञानिक, शैक्षिक, आर्थिक जनसंसदों आदि का भी गठन किया जायेगा। ​


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