संवैधानिक सुधारों हेतु दृष्टिपत्र

BY : MB

ह सर्वविदित है कि भारत का संविधान मूलत: बिटिश संसद के द्वारा बनाए गए ढाँचे, नियमों व कानूनों तथा कुछ अन्य देशों के संविधान से की गयी व्यवस्थाओं का सम्मिलन है। संविधान के व्यवहार मेंं, क्रियान्वयन में अनेकों खामियां/कमियां व सुझाव संविधान विशेषज्ञों/न्यायपालिका, बुद्धिजीवियों व सांसदो आदि द्वारा दिया गया है। राष्ट्रहित में इन सुझावों केे अनुरूप संविधान को पुनर्गठित एवं संशोधित करने हेतू एक संविधान समीक्षा आयोग का गठन तुरन्त प्रभाव से किया जाना आवश्यक है। ठ्ठ हम देश का प्रशासनिक आधार पर पुनर्गठन आवश्यक समझते हैं तथा अधिक छोटे अथवा अधिक बड़े राज्यों के विरूद्ध है।

संविधान में वर्णित नीति निर्देशक तत्वों को व्यवहार में लाना अब समय की आवश्यकता है। दु:खद है हमारी सरकार इन आदर्शो को व्यवहार में लाने के लिए संवेदनशील नहीं हैं। हम नीति निदेशक तत्वों को मौलिक-कानूनी अधिकार के रूप में मान्यता देने की माँग करते हैं। ठ्ठ संविधान ने सुविधा की दृष्टि से राज्यों व केन्द्र के कामों का बंटवारा किया था। व्यवहार में केन्द्र सरकारें अपने प्रभुत्व को दिखाती हुई पक्षपात करनी दिखती है और समवर्ती सूची से संबंधित विषयों में अत्यधिक सक्रियता दिखा रही है जिससे स्थानीय हितों पर कुठाराघात हो रहा है। हम देश के राज्यों का प्रशासनिक दृष्टि से पुनर्गठन, तुलनात्मक रूप से छोटे राज्यों, समवर्ती सूची का राज्य सूची में विलय और केन्द्रीय सूची के कम महत्वपूर्ण कार्यो को भी राज्यों को सौंपे जाने की माँग करते हैं। ठ्ठ भारत में न्याय तंत्र में खासी विषमता, जटिलता व बिखराव है। हम सम्पूर्ण न्यायपालिका, सभी कानूनों व व्यवस्थाओं के पुनर्गठन व समसामायिक संदर्भो में पुर्नव्यवस्था व संसोधन की मांग करते है, हम चाहते है हमारी न्याय प्रणाली स्वायत्त, निष्पक्ष त्वरित, प्रभावी एवं जवाबदेह हो। ठ्ठ भारत में सार्वजनिक पद पर चुने व्यक्तियों के लिए मापदंडों को पुन: परिभाषित करना बहुत आवश्यक है। अधिकांश पदों पर व्यवसायिक मानसिकता अथवा पक्षपाती प्रवृत्ति के लोगों का बोलवाला है, इससे जनहित में होने वाले कार्यो की मात्रा घटी है और समाज में असंतोष फैलता जा रहा है। इसे दूर करने की प्रभावी व्यवस्था हमारी माँग है।

भारत के सभी लोक सेवक, जनप्रतिनिधि व सरकारी कर्मचारियों की जवाबदेही शून्य है। ये सामंतवादी मानसिकता से ग्रस्त है। इस व्यवस्था में आमूलचूल परिर्वत करने, इसे जनकेन्द्रित व जबावदेह बनाने की स्थायी व्यवस्था आवश्यक है। लोकसेवकों के सेवानिवृत हो जाने के बाद की सक्रियता पर स्पष्ट प्रभावी व जबावदेह नीति हमारी माँग है।

भारतीय आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था व पुलिस प्रशासन की कार्यशैली एवं इससे संबधित कानून सवालों के घेरे में हैं, पुलिस की निष्पक्षता पर गंभीर प्रश्नचिह्न हैं, पुलिस सुधारों पर विभिन्न आयोगों के सुझावों को तुरन्त प्रभाव से लागू करना जनहित में एवं राष्ट्र हित में अत्यावश्यक है। ठ्ठ सभी सरकारी/सार्वजनिक/राजनीतिक पदो व लोकसेवाओं पर लगे आरोपों की समयबद्ध स्वतंत्र व निष्पक्ष जाँच व कठोर दंडों के प्रावधानों को तुरन्त लागू किया जाना चाहिए। इन पदों पर नियुक्त व्यक्तियों की निष्पक्ष व पारदर्शी स्थानांतरण नीति होनी चाहिए। ठ्ठ संवैधानिक रूप से सभी लोक सेवको, राजनीतिक पदों पर बैठे व्यक्तियों की किसी भी प्रकार की विशिष्ट शक्तियों की समाप्ति की जानी चाहिए।

केन्द्र राज्यों के बीच वित्तीय बंटवारे में लगातार पक्षपात की शिकायते हैं इसकी पारदर्शी व निष्पक्ष व्यवस्था होनी चाहिए। योजना आयोग का वित्त मंत्रालय में विलय होना चाहिए। नदी जल बटवारे के लिए स्थायी रूप से स्वायत्त आयोग का गठन होना चाहिए। ठ्ठ प्रत्येक जिले में चुनाव लडऩे वाले एवं चुने गये जनप्रतिनिधियों के प्रशिक्षण के लिए प्रशिक्षण संस्थानों की संवैधानिक व्यवस्था होनी चाहिए।​


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