​सामाजिक सुधारों हेतु दृष्टिपत्र

BY : MB

देश में विभिन्न दलों, संगठनों व संस्थनों को मिलने वाले सीधे विदेशी अनुदानों पर प्रतिबंध होना चाहिए। इसके स्थान पर अन्र्तराष्ट्रीय अनुदान कोष होना चाहिए जो संसद के निर्देशों के अनुरूप कार्य करे। ठ्ठ देश की शिक्षा व्यवस्था में बहुत विषमताएं अराजकता व बिखराव हैं इसका एकीकरण कर 6 वर्ष से अधिक के सभी बच्चों को आवासीय विद्यालयों में दसवीं तक नि:शुल्क व अनिवार्य शिक्षा दी जानी चाहिए। इस क्षेत्र में गुणवत्ता नियंत्रण, कौशल उन्नयन, रोजगारपरक व उच्च शिक्षा के लिए भी स्पष्ट नीतियां बनें। कोचिंगो व ट्यूशनों पर प्रतिबंध लगे। शिक्षा में स्वदेशी अनुसंधान नवोन्मेष एवं स्वरोजगार पर जोर होना चाहिए। ठ्ठ धार्मिक संगठनों को विदेशी अनुदान, भारतीय सिविल सोसाईटी के कुछ धड़ो, चर्च, राजनीतिक दलों, विदेशी शक्ति व मीडिया के बीच राष्ट्रविरोधी गठजोड़ पर तुरन्त प्रभाव से रोक के लिए कानूनी प्रावधान व कड़ी कार्यवाही होनी चाहिए। अल्पसंख्यकवाद के स्थान पर मानवतावाद व समान नागरिक संाहिता की ओर बढऩा चाहिए।

मीडिया व अन्य संचार के संसाधन अपनी प्रभावी भूमिका निभाने में असमर्थ रहे हैं। ये अक्सर राजनीतिक दलों, विदेशी कम्पनियों व कारपोरेट घरानों की कठपुतली बन जाते हैं। इनमें लिए स्वायत्तता, उचित वित्तीय पोषण, स्पष्ट जिम्मेदारियों व जवाबदेही के साथ सोशल ऑडिट की भूमिका भी दी जानी आवश्यक है। सरकार व जनता के बीच संवाद का माध्यम बनने के लिए इन्हें और प्रभावी बनाना आवश्यक है।

हमारे शिक्षा संस्थानों विशेषकर उच्च शिक्षा के संस्थानों का क्षेत्रीय विकास मेंं प्रभावी भूमिका को नजरअंदाज किया गया है। इनको स्पष्ट व प्रभावी भूमिका देने की कार्यप्रणाली विकसित करना आवश्यक है। ये जिला स्तर पर समाजसेवियों, लोकसेवको, बुद्धिजीवियों, पत्रकरों व जागरूक लोगों, विभिन्न सरकरी योजनाओं व कार्यालयों के बीच तालमेल के अभिकरण वन सकते हैं। विकास के लिए आवश्यक सर्वेक्षण, अनुसंधन व डाटा उपलब्ध करा सकते है तथा राज्यों व केन्द्र सरकार को योजना निर्माण व क्रियान्वयन में स्थानीय प्रेस,/मीडिया व जिला प्रशासन के माध्यम से शुद्ध व सही सुझाव/डाटा आदि पहुँचा सकते हैं। नयी पीढ़ी की सोच व आवश्यकता को श्रंखलाबद्ध करने में भी इनकी प्रभावी भूमिका हो सकती हैं। शिक्षा में योग व अध्यात्म का समावेश आवश्यक है।

हमने घातक रूप से अपनी स्वास्थ्य सेवाओं का निजीकरण कर दिया है और सरकारी सेवाऐं निम्न स्तर की व अविश्वसनीय हैं। जीने का अधिकार हमारा मौलिक अधिकार हैं और स्वास्थ का सही रहना इसकी कुँजी। इस अवधारण पर नि:शुल्क व प्रभावी स्वास्थ्य सेवाओं का प्रावधान सरकार का दायित्य हो। भारतीय स्वास्थ्य पद्धतियों आयुर्वेंद को बढ़ावा भी इसी का एक आयाम होना चाहिए।

जनसंख्या का विकराल होता रूप हमारे संसाधनों को खाता जा रहा है व व्यवस्था को लाचार बना रहा है। जनसंख्या नियंत्रण समय की आवश्यकता है। प्रभावी जनसंख्या नीति, जनसंख्या राशनिंग, एक परिवार एक या दो संतान की नीति को सीमित समय के लिए अनिवार्य करना आवश्यक है। ठ्ठ छात्रवृत्ति, अनुदानों, पेंशनों, सब्सिडी, कर छूट आदि को प्रतिबंधित कर, कम करों वाली प्रणाली एवं सबको रोजगार की नीति अपनानी चाहिए। एक परिवार एक रोजगार का प्रावधान हो तथा परिवार को व्यक्ति व समष्टि के बीच महत्वपूर्ण व कानूनी इकाई वे रूप में मान्यता मिलना जरूरी है।

अंग्रेजी भाषा के वर्चस्व ने भारतीयों में खासी हीन भावना का प्रसार किया है। दुनिया के सभी विकसित देश अपनी-अपनी भाषाओं में ही विकास कर सके हैं इस तथ्य को ध्यान रख भारतीय भाषाओं में सभी तरह की शिक्षा को प्राथमिकता देना आवश्यक है। यद्यपि हम अंग्रेजी की महत्वता को नकार नहीं रहे हैं, किन्तु इसकी स्थिति द्वितीय स्तर पर ही होना चाहिए।

देश के ग्रामीण समाज के हितों पर लगातार कुठाराघात हुआ है। कृषि उत्पादों के मूल्यों पर नियंत्रण कर किसानों की आय को रोका गया है। यह नियंत्रण हटाना जरूरी है। कृषि पदार्थों को बेचने के लिए मंडी तथा संग्रहण के लिए गोदामों/ प्रशीतलन गृहों की प्रत्येक ग्रामपंचायत में उपस्थिति अनिवार्य होनी चाहिए। ग्रामों की मूलभूत सुविधाओं का विकास, अच्छी सड़के व कृषि आधारित उद्योग, जैव कृषि का निकास बहुफसली पद्धतियों का विकास, सहकारिता, कुटीर उद्योगों को जोर देकर ग्रामीण समाज की आय में कई गुना वृद्धि की जा सकती है।

ग्राम स्वराज की भावना के विकास हेतू पंचायतों का कानूनी व आर्थिक सशक्तिकरण व स्वायत्तता अनिवार्य है। भूमि अधिग्रहण की स्पष्ट नीति, कृषि योग्य भूमि के अधिग्रहण पर प्रतिबंध, अधिग्रहण की स्थिति में 90प्रतिशत मालिकों से सहमति की अनिवार्यता के प्रावधान होने चाहिए। जल, जंगल जमीन के पर्यावरणीय संतुलनों को बनाये रखने, इस पर रहने वालों के मौलिक व मूलभूत अधिकारों के संरक्षण के प्रावधन स्पष्ट व प्रभावी होने चाहिए। हमारे पशुधनों, ग्रामीण अर्थव्यवस्था व नदियों के संरक्षण व संर्वधान के लिए स्पष्ट, स्थायी व दूरगामी नीतियों व बाह्यकारी कानून आवश्यक है।

पंचायतें आज सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन की कमीशन ऐजेंट बनकर रह गयी हैं। इस चलन ने ग्रामीणों को भी भ्रष्ट बनाया है योजनाओं को ग्रामपंचायतों के जरिये लागू करने हेतू ग्रामसभाओं केा जागरूक सक्रिय सक्षम व जिम्मेदार बनाने की व्यवस्था की जानी चाहिए।

सभी प्रकार के आरक्षणों , विशेषाधिकार व संरक्षणों की समाप्ति होनी चाहिए । सभी पदों निजी/सरकारी/सार्वजनिक पर चयन के उपरान्त गहन व दीर्घकालिक प्रशिक्षण अनिवार्य हों। पदोन्नति अथवा सेवा काल को बढ़ाना कार्यकुशलता के आधार पर हो।

महिलाओं के समान अधिकारों, विकास गरिमा व समान का प्रभावी संरक्षण, उनकी सार्वजनिक जीवन में प्रभावी व निर्णायक भूमिका सुनिश्चित करने के प्रावधन । भ्रूण हत्या, देहज, महगी शादियों पर पूर्ण प्रतिबंध, वेश्यावृत्ति की समाप्ति के लिए व वेश्याओं के पुनर्वास के लिए प्रभावी उपाय। बूढ़ों, बेरोजगारों, घरेलू विधवाओं व अशक्तों, विकलांगों, मनोरोगियों, विशेष बच्चों आदि के संरक्षण व विकास के लिए स्पष्ट व प्रभावी कार्य।

देश में आंतरिक सुरक्षा तंत्र की चुनौती बने सभी कारकों यथा सीमावर्ती राज्यों में आतंकवाद, खनिज पट्टी में नक्सलवाद, भाषा, देश, जाति व धर्म पर आधारित आदोंलनों से निपटने के लिए स्पष्ट नीति व कार्ययोजना के पक्षधर हैं तथा इन राष्ट्रविरोधी मांगों को राजनीतिक रूप देने की अनेक दलों की योजना पर प्रतिबंध की मांग करते हैं। सभी धार्मिक/सामाजिक संस्थाओं की शैक्षिक गतिविधियों को सरकारों क्षेत्र में लेकर पूरे देश मे समान शैक्षिक व्यवस्था के समर्थक हैं जिसके संचालन की जिम्मेदारी स्थानीय निकायों के पास हो।

सीमापार आंतकवादी शिविरों को सैन्य कार्यवाही द्वारा नष्ट करने तथा देश पर होने वाले प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष हमले का कड़ाई से जवाब देने की नीति की हम माँग व समर्थन करते हैं।

जन संसद, जन नेता, जनघोषणा पत्र ठ्ठ मौलिक भारत राष्ट्र के प्रति स्पष्ट सोच वाले व्यक्तियों, समूहों व संगठनों का सांझा मंच है जो अपनी-अपनी निजी पहचान, अहम् व स्वार्थों को परे रख राष्ट्रीय हितों व भारतीयता के विकास के लिए एक साथ आये हैं। ठ्ठ मौलिक भारत मानता है कि यदि कोई व्यक्ति, समूह या संगठन राष्ट्र के प्रति समर्पित हो तो अपने संगठन के सीमाओं से पार जाकर भी वह उसे समर्थन दे सकता है।

मौलिक भारत भारत के संविधान के मूल दर्शन में पूर्ण आस्था रखता है और यह जानता है कि हमारी राज-व्यवस्था कतिपय कारणों व अपनी कमजोरियो के कारण भटकाव का शिकार हो गयी है और संविधान के मौलिक स्वरूप व आदशों को मूर्तरूप नहीं दे पा रही है। निश्चित रूप से यह हमारे नेतृत्व की असफलता है। अत: हम पंचायत से लेकर संसद तक देश में नये नेतृत्व के निर्माण की प्रक्रिया प्रारम्भ करना चाहते हैं।

हम ऐसा नेतृत्व विकसित करना चाहते हैं जो ग्राम से लेकर केन्द्र तक एक विकल्प के रूप में स्थापित हो, जिसको अपने पद की जिम्मेदारियों का सम्पूर्ण रूप से ज्ञान हो, जो साखयुक्त हो जिसमें नेतृत्व के गुण हों और जो समग्र चिन्तन रखता हो। ऐसे व्यक्तियों का समूह ही देश में समग्र व्यवस्था परिवर्तन कर सकता है और संविधान को भी अधिक व्यवहारिक, लोकतांत्रिक, भारतीय, जन केन्द्रित, समसामयिक संदर्भो में प्रासंगिक बना सकता है।

नये नेतृत्व के विकास के मौलिक कार्य को व्यवहार में लाने के लिए 'मौलिक भारतÓ पंचायत, ब्लाक, जिला, राज्य व राष्ट्रीय स्तर पर 'जनसंसदÓ का गठन करेगा। अनेक वर्षों के चिंतन, मनन व अध्ययन के उपरांत 'मौलिक भारतÓ ने एक 'दृष्टिकोण पत्रÓ प्रस्तुत किया है। हम इसे लेकर जनता के बीच जायेंगे।

जन संसदों में जनता इन मुद्दों पर गंभीर व सारगर्भित बहस करते हुए है, इस दृष्टिकोण पत्र को संशोधित करेगी। इन संशोधनों व मंथन के निष्कर्ष के रूप में प्राप्त अंतिम 'जन घोषणा पत्रÓ को व्यवहार में लाने के लिए हम राजव्यवस्था पर लोकतांत्रिक तरीके से दबाब डालेंगे।

हमारे प्रयास रहेंगे कि अगले कुछ वर्षों में सम्पूर्ण देश में नये नेतृत्व का विकास हो सके तथा जनसंसदों द्वारा स्वीकृत दृष्टिकोण पत्र से स्वीकृत मुद्दों के इर्द गिर्द ही राजनीति हो। ऐसी राजनीति देश को एक बौद्धिक एवं आर्थिक रूप से विकसित राष्ट्र के रूप में स्थापित कर देगी जो पूर्णत: लोकतांत्रिक, जन केन्द्रित एवं समग्र होगा।

अपने परिपक्व रूप में जन संसदें जन निगरानी तंत्र, जन लोकपाल व सामाजिक अंकेक्षण का कार्य भी करने लगेगी। साथ ही प्रत्येक जन संसद एक सहायता नंबर एवं पोर्टल भी चलायेगी जो सभी शिकातें एवं सुझावों को संबधित व्यक्तियों जनप्रतिनिधियों, मीडिया सरकारी गैर सरकारी अधिकारियों तक पहुँचाकर तुरन्त आवश्यक कार्यवाही हेतू सतर्क करेगी।

विभिन्न जनससंदों से आने वाले सुझावों को अधिक स्पष्ट, व्यवस्थित एवं बहु आयामी करने के लिए ई-संसद की शुरूवात केन्द्रीय जनसंसद करेगी। ठ्ठ प्रारभ में मौलिक भारत की केन्द्रीय राज्य जिला व ब्लाक इकाईयां जनसंसदों का गठन करेंगी


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