​आर्थिक सुधारों हेतु दृष्टिपत्र

BY : MB

देश जी.डी.पी. आधारित विकास दर के मापदण्डों पर बढ़ रहा है विकास कर रहा है किन्तु यह व्यक्ति के विकास को इंगित नहीं करता। राष्ट्र की जी.डी.पी. बढ़ रही है किन्तु आम व्यक्ति (70-80 प्रतिशत लोगों) की आय में खास बढ़ोत्तरी नहीं है। वर्तमान विकास मात्र 10-20 प्रतिशत लोगो की संवृद्धि का वाहक बन गया है। हम इकाईवाद के समर्थक है तथा जी.डी.पी. के साथ आय व अवसरों के समान वितरण व हयूमन हैप्पीनेस इंडेक्स (मानव संतुष्टि मानक, एच.एच. आई) के समर्थक है। अत: हम आर्थिक नीतियों में जनकेन्द्रित बदलावों की मांग करते है।
हम भारत को एक बड़ी संख्या वाले राष्ट्र के रूप में देख रहे है जो 100 प्रतिशत शहरी हो ही नहीं सकता। हमारी 60-65 प्रतिशत जनता कृषि व ग्रामीण व्यवस्था के इर्दगिर्द है। अत: हमारी मांग है कि राष्ट्र के संसाधनों का बटंवारा जनसंख्या के अनुरूप हो। शहरीकरण की तथा शहरों के विकास की सीमाएं लागू हों। अधिकतम 50 प्रतिशत जनसंख्या का ही शहरीकरण किया जाये। विकास की हदबंदी हो, शहरों के फैलाव की हदबंदी हो और जनसंख्या के शहरीकरण की हदबंदी हो। देश की आर्थिक नीतियां शहरी व ग्रामीण दृष्टिकोण से अलग-अलग बने व इसके लिए आवश्यक कानूनी व संवैधानिक प्रावधान हों। 5 लाख से अधिक आबादी के शहरों के विकास पर प्रतिबंध होना चाहिए।
देश के विकास का जन-निजी भागीदारी पीपीपी माडल विफल साबित हो चुका है। सार्वजनिक निगमों व सरकारी सम्पत्तियों, खनिज व प्राकृतिक संसाधनों की लूट ने निजीकरण व पूॅजीवादी व्यवस्था की कलई खोल दी है। हमारे मंत्रालयों के अधिकारियों ने काम करना बंद कर दिया है और नीति निर्माण का कार्य विदेशी कम्पनियों, अन्तरराष्ट्रीय कूटनीतिज्ञ व 125 परामर्शदाता कम्पनियां व कारपोरेट मिल कर रहे हैं। यह पूर्णत: जनविरोधी व संविधानविरोधी है और हम इसका पुरजोर विरोध करते है। हम बाजारविरोधी नहीं है और मिश्रित अर्थव्यवस्था के पक्षधर हैं। हम सहकारिता को बढ़ावा दिये जाने के पक्षधर हैं और प्राकृतिक व खनिज संसाधनों पर जनता के हक को सही मानते है और सरकार को इसके कस्टोडियन (संरक्षक) की भूमिका में देखते हैं और इसके लागू करने हेतू संवैधानिक प्रावधानों की मांग करते हैं। देश में सरकारी व निजी क्षेत्र के साथ साथ विभिन्न उद्योग समूहों, धार्मिक व सामाजिक संगठनों व जमीदारों के पास बहुत सारी अनुपयोगी भूमि पड़ी है। हम इस सभी भूमि का राष्ट्र हित में अधिग्रहण कर भूमि-बैंक बनाने के पक्षधर हैं ताकि आगामी योजनाओं हेतू कृषकों से भूमि अधिग्रहण करने के स्थान पर इस भूमि का उपयोग किया जा सके। भूमि अधिग्रहण की स्थिति में पुनर्वास, उचित मुआवजा व समयबद्ध क्रियान्वयन की प्रभावी व्यवस्था होनी चाहिए।
बेतरतीब शहरीकरण के कारण शहर कुव्यवस्था, स्लम संस्कृति, अपसंस्कृति व बिल्डरों के व सरकारी अधिकारियों व नेताओं के लूट तंत्र की मिसाल बन चुके हैं। सभी स्लमों का सुविधाओं से सम्पन्न कालोनियों में परिवर्तन, बिल्डरों पर नियंत्रण के लिए प्रभावी कानून, विकास प्राधिकरणों की प्रभावी भूमिका व अधिक शहरीकरण पर रोक के प्रावधान समय की माँग है।
देश कारपोरेट घरानों के मकडज़ाल में है। एक-एक कर ये घराने सारे संसाधन हड़पते जा रहे हैं। ये नीति निर्माण प्रक्रिया को अपने हित में बदलने में सफल रहे हैं। दुर्भाग्य से ये खुले बाजार के प्रावधानों व मापदंडों पर खरे नहीं उतरते। इनकी प्रवृत्ति सामंतवादी व अधिनायकवादी हैं। आश्चर्यजनक रूप से इस कम्पनियों के 80-90 प्रतिशत शेयरों पर इसके प्रमोटरों का कब्जा है जो विश्व के विकसित देशों उदारवाद के मानकों के विरूद्ध है जहाँ यह शेयर 10 से 25प्रतिशत तक ही हैं तथा अन्य शेयर धारको की संख्या लाखों या करोड़ों में है। इन कम्पनियों ने नियमों में फेर बदल कर बॉयबैक पद्धति से धीरे -धीरे अपने शेयर वापस खरीद कर पूरी कम्पनी पर कब्जा कर लिया और उदारवाद को लूटतंत्र में बदल दिया है ।
कारपोरेट घरानों की कार्यप्रणाली संदिग्ध है व देश के विरूद्ध भी। ये विदेशी निवेश (मारिशस रूट, मलशिया रूट व सिंगापुर रूट) के नाम वह भारी मात्र में कालेधन को वापस अपने उद्योगों में लगा रहे हैं। आश्चर्यजनक रूप से पिछले 5 वर्षों में उद्योगों द्वारा लिए 14 लाख करोड़ रूपये के ऋण का अधिकांश भाग विदेशी निवेश व विदेशो में सम्पत्तियों, खानों व कम्पनियों के अधिग्रहण में लगा दिया था। आर्थिक मंदी के नाम पर भी ये उद्योग, सरकार से 13 लाख करोड़ रूपयों की कर छुट ले चुके हैं। देश में पिछले कुछ वर्षो में खुले लाखों करोड़ के घोटालों में इनकी सत्ता तंत्र के साथ नापक गठजोड वे घोटालों का लगातार खुलासा हुआ है। इन्होंने पिछले आठ वर्षों में भारी ऋण लेने के बाद भी मुश्किल से 20 लाख रोजगार भी पैदा नहीं किये। जिस कारण देश के युवाओं में व्यापक बेरोजगारी व असंतोष फैला हुआ है। हम इस करपोरेट लूट व गठजोड़ को रोकने व इस पर प्रभावी कार्यवाही करने की मांग करते हैं।

हम कालेधन की अर्थव्यवस्था, सरकारी तंत्र की लूट व कारपोरेट अराजकता के विरूद्ध एक प्रभावी नियंत्रण तंत्र स्थापित करने की मांग करते है। इसे प्रभावी बनाने के लिए ''एक व्यक्ति/फर्म/कम्पनी/ एनजीओ - एक बैंक खाताÓÓ की मांग करते है। यह बैंक खाता, पहचान पत्र व सभी वित्तीय लेन देन के स्रोत के रूप में कार्य करे यह हमारी मांग है।
हम सट्टा, जुआ, वायदा करोबार, शेयर बाजार, नशे की अर्थव्यवस्था, जमीनों के बेनामी सौदों के खिलाफ हैं। अगर किसी स्तर पर यह सीमित मात्रा में अनिवार्य हो तो इन पर उचित प्रतिबंध, नियमन, व स्पष्ट कानून व पारदर्शी नियंत्रण तंत्र होना चाहिए। साथ ही देश और विदेशों में मौजूद कालेधन की वापसी के पुख्ता एवं समयबद्ध उपाय लागू होने चाहिए। हम प्राकृतिक व खनिज संसाधनों पर समाज का हक व नियंत्रण मानते है व सरकार की भूमिका इसके संरक्षक की समझते है। इस अवधारणा को कानूनी रूप देना अनिवार्य है।
हम करों, कर प्रणाली के सरलीकरण व सीमितकरण की मांग करते है व कर चोरी के सभी रास्तों पर प्रतिबंध के प्रावधानों को लागू करने की मांग करते है।
उपभोक्ता संरक्षण के लिए कठोर कानूनी प्रावधांन व प्रत्येक ब्लाक में अदालतें तथा उनमें योग्य न्यायधीश व समयबद्ध निर्णयों का प्रावधान हो।
हम निजीकरण के विरोधी नहीं है किन्तु निजी क्षेत्रों के नियंत्रण के नियमीकरण की स्पष्ट व प्रभावी व्यवस्थाएं व इसके रोजगारपरक होने की मांग करते है। हम सी.एस.आर. फंड को लाभ का 5प्रतिशत करने की मांग करते है व इसको एक संसदीय कोष द्वारा एकत्र कर सामाजिक हितों में खर्च करने की मांग करते हैं।
हम तकनीक, प्राद्यौगिकी, अनुसंधान, शोध व उपभोक्ता सामान सभी में स्वदेशी की मांग करते है तथा भारतीय शिक्षा संस्थानों में पढ़े लोगों की विदेश जाने पर राष्ट्रीय हित में एक नीति पत्र की मांग करते है। हम उच्च शिक्षा में विदेशी निवेश व संस्थानों के प्रवेश के खिलाफ हैं।
हम रिटेल, पेंशन-बीमा, मीडिया, शिक्षा, स्वास्थ्य व संचार में विदेशी निवेश के खिलाफ हैं।
आर्थिक विकास को समग्र विकास की ओर मोडऩे के लिए उत्पादन व उपभोक्ता के बीच की दूरी घटना आवश्यक है। जिसके लिए विभिन्न के बीच में तालमेल की जिम्मेदारी केा केन्द्रित करने तथा क्रियान्वयन को विकेन्द्रित करना जरूरी है।
हम प्राकृतिक संसाधनों के इस्तेमाल की चक्रीय व्यवस्था अपनाने के पक्षधर हैं। सीमित उपयोग, उपयोग से हुई क्षतिपूर्ति की भरपाई और फिर सीमित मात्र में उपयोग। जिससे हम अनन्त समय तक पृथ्वी पर पीढ़ी दर पीढ़ी अपने अस्तित्व को बनाये रख सकें।

बिजली, पानी जंगल, खनन, औद्योगिक उत्पाद सबके उपयोग की सीमाऐं निधारित करना जरूरी है। प्राकृतिक संसाधनों पर पहला हक स्थानीय नागरिकों का हो व उनकी इसके अनुरूप शिक्षा व प्रशिक्षण हो ।
भू संसाधनों का जंगल हेतू 33 प्रतिशत आरक्षण किया जाना सरकारी नीति है ऐसे ही कृषि भूमि, नदी भूमि, पहाड़, जलसंचयन ढांचा क्षेत्र, चारागाहों आदि के भू क्षेत्र का निर्धारण भी जरूरी है। इसे फारेस्ट रिजर्व (संरक्षित वन) के अनुरूप एग्रोरिवर कॉमन रिजर्व एरियाÓ के रूप में नोटिफाइ किया जा सकता है।
शहरीकरण व नगरविकास का स्पष्ट ढांचा बनाना होगा व सभी शहरों का पुनर्निर्माण इसी के अनुरूप हो। ग्रामीण, शहरी, औद्योगिक, संस्थागत, रिहायशी, हरित सभी क्षेत्र का आबादी व भूगोल के अनुसार स्पष्ट बटंवारा जरूरी है।
आबादी के अनुरूप ही सभी संसाधनों का विकास जरूरी है। प्रकृति कितने मानवों का भार वहन कर सकती है, विकास के समय यह जरूरी शर्तें होनी चाहिए। विकास ऐसा हो कि लोग शहरोन्मुखी न हों, ग्रामोन्मुखी हों तब संतुलन बना रहेगा। इसके लिए ग्रामों में मूलभूत सुविधाएं जो गुणवत्तापूर्ण हों, का विकास आवश्यक है। ठ्ठ जल यातायात, गैर परम्परागत ऊर्जा स्रोतों के तीव्र विकास की येाजनाएँ बनें। ठ्ठ 100 प्रतिशत सरकारी, सार्वजनिक व सरकारी निजी भागीदारी वाली योजनाओं, आमदनी व खर्च का सरकारी व सामाजिक व ऑडिट का प्रावधान होना चाहिए।
हम सभी बैकों व वित्तीय तंत्र द्वारा किसी भी प्रकार के ऋणों के वितरण की व्यवस्था की पारदर्शी व श्रेष्ठ मापदण्डों पर आधारित प्रक्रिया चाहते है व पिछले सभी ऋणों के वितरण की समीक्षा की मांग करते है।
देश में जाली नोटों के प्रसार के पीछे के कारण व निवारण की प्रणाली विकसित करने की मांग करते हैं।
हम सीएजी के अधिकारों में वृद्धि की मांग करते हैं तथा सौ प्रतिशत सरकारी, निजी-सार्वजनिक भागीदारी की सभी योजनाओं तथा सञ्जाी सरकारी खरीद व खर्चों की सीएजी द्वारा ऑडिट की मांग करते हैं।
वस्तुत: उपरोक्त सभी कार्य व सुधार करने के बाद ही हम विकसित देश बनने की तरफ अग्रसर हो सकेंगे। इस स्थिति में पहुँचने के बाद हमने तीसरे व अंतिम दौर के दृष्टिकोण पत्र के रूप में विस्तृत रूप से अपनी वेबसाईट द्धह्लह्लश्च://222.द्वड्डह्वद्यद्बद्मड्ढद्धड्डह्म्ड्डह्ल.शह्म्द्द पर दिया है जिसके पूर्णत: परिपालन के उपरान्त भारत विश्व का सबसे सुखी, विकसित व विकेन्द्रित व प्रकृति केद्रित विकास का उदाहरण बन जायेगा।हमारा उद्देश्य राजनीति तंत्र व आर्थिक तंत्र की तर्क आधारित कार्यप्रणाली तथा सामाजिक तंत्र व धार्मिक तंत्र की भावनाओं पर आधारित जीवन शैली के बीच विशिष्ट समन्वय स्थापित करना है।

ञ्चयों नहीं लागू होते नीति निर्देशक तत्व?

1. अनु. 39(ख) समुदाय के भौतिक संसाधानों के स्वामित्व व नियन्त्रण के इस प्रकार के वितरण को सुनिश्चित करने की अपेक्षा राज्यों से करता है, जिससे सामुहिक हित को सर्वोत्तम तरीके से साधा जा सके और अनु. 39 (ग) में आर्थिक व्यवस्था के इस रूप में संचालन पर जोर देता है, ताकि आर्थिक संकेन्द्रण की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाया जा सके। 25वें सविधन संशोधन के द्वारा अनु. 31 ग जोड़ते हुए अनु. 39 (ख) और (ग) को अनु. 14 में उल्लेखित मूलाधिकारों पर वरीयता दी गई। संसद के इस रूख को केशवानन्द भारती वाद के निर्णय में न्यायपालिका ने भी स्वीकार किया और इसी से उत्साहित होकर 44वें संविधान संशोधन द्वारा सम्पति के अधिकार को मूल अधिकारों की श्रेणी से बाहर कर वैधानिक अधिकारों का दर्जा दिया गया।

2. अनु. 39 (घ) पुरूष और स्त्रियों के लिये समान कार्य के लिये समान वेतन की बात करता है। इस दिशा में कदम उठाते हुए, राज्य के द्वारा अधिकाधिक स्तर पर लोक-नियोजन में इस संकल्पना को लागू किया गया। अनु. 39 समान न्याय और नि:शुल्क विधिक सहायता का उपबन्ध करता है। इस परिप्रेक्ष्य में राज्य गरीब और अभावग्रस्त लोगों को, जो अपने लिए विधिक सहायता उपलब्ध करवा पाने में असमर्थ हैं, नि:शुल्क विधिक सहायता उपलब्ध कराता हैं। किंतु व्यवहार में अभी बहुत कुछ किया जाना है।

3. अनु 40 ग्राम पंचायतों के गठन और उनके सशक्तिकरण की अपेक्षा राज्य से करता है। 73वें संविधान संशोधन के द्वारा ग्राम पंचायतों को वैधानिक ढांचा प्रदान किया गया और उनमें कमजोर व वंचित वर्ग के लोगों की राजनीतिक भागीदारी को सुनिश्चित करने के लिए आरक्षण का प्रावधान किया गया। किंतु पंचायतों के आॢथक सशञ्चितकरण के अभाव में इनकी प्रासंगिकता बहुत कम है।

4. अनु. 41 कुछ दशाओं में काम, स्वास्थ्य और लोक सहायता पाने के अधिकार का उल्लेख करता है। अनु. 45 अपने मूल रूप में राज्य से यह अपेक्षा करता है कि वह 6-14 वर्ष की उम्र तक के बच्चों की अनिवार्य व नि:शुल्क प्राथमिक शिक्षा की व्यवस्था करेगा। 86वें संविधान संशोधन के द्वारा 2002 में अनु. 21 जोड़ते हुए अनिवार्य व नि:शुल्क प्राथमिक शिक्षा को मूलाधिकार का दर्जा दिया गया। इसी आलोक में शिक्षा का अधिकार अधिनियम लागू किया गया। इससे पूर्व 1992 के मोहित जैन वाद में सुप्रीम कोर्ट ने प्राथमिक शिक्षा के अधिकार को अनु. 21 से जोड़कर देखते हुए, मूलाधिकार का दर्जा दिया, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट की दृष्टि में अनु. 31 के अन्तर्गत गरिमामय जीवन का अधिकार समाहित है और प्राथमिक शिक्षा को उपलब्ध करवाये बिना गरिमामय जीवन को सुनिश्चित नहीं किया जा सकता।

इसी प्रकार जीवकोपार्जन के अधिकार की अनु. 21 के परिप्रेक्ष्य के व्याख्या करते हुये न्यायपालिका ने यह स्पष्ट किया कि किसी को न्यूनतम मजदूरी न देना अनु. 21 का उल्लंघन है। सरकार के द्वारा कई रोजगारपरक कार्यक्रम आरंभ से ही चलाये जा रहे हैं। विशेष रूप से 1970 के दशक और उसके बाद ऐसे कार्यक्रमों की संख्या बढ़ती चली गई। 2005 में सरकार ने नरेगा (अब मनरेगा) के तहत ग्र


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